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Pratiband Aur Pratirodh(1850-1947)

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2025
978-9347602986

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लमही' का यह अंक उस अकादमिक यात्रा की एक उपलब्धि है जिसकी शुरुआत हमने औपनिवेशिक काल में प्रतिबन्धित हिन्दुस्तानी लेखन को समर्पित एक शोध परियोजना के रूप में तब की थी जब अपना देश कोरोना महामारी के चक्रव्यूह से निकल कर आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा था। हमारी विडम्बना यह थी कि हमारे शोध के लिए अनिवार्य और अपेक्षित प्राथमिक स्रोत जिस ब्रिटिश लाइब्रेरी में मौजूद थे, वह अनिश्चित काल के लिए बन्द थी। देश के जिन अभिलेखागारों में हमें जाना था उनकी स्थिति भी वही थी। हमने अपनी शोध रणनीति में संशोधन करते हुए इस विषय से जुड़े विशेषज्ञों से सम्पर्क करना शुरू किया और इसी प्रक्रिया में ऑनलाइन विचार गोष्ठियों का सिलसिला शुरू हुआ। हमारी इस शोध परियोजना ने हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय और भारतीय भाषा कार्यक्रम, सी एस डी एस, दिल्ली के बीच पहली बार एक ऐसा साझा मंच तैयार किया जिसमें न सिर्फ भूगोल की दूरी कम हुई बल्कि ज्ञान के कई अनुशासन भी एक मंच पर आये। इतिहास, राजनीति, संस्कृत, अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, तेलुगू, रंगमंच और संगीत जैसे प्रायः दूर-दूर खड़े दिखाई देने वाले अकादमिक अनुशासन अपने देश के सांस्कृतिक इतिहास की उस खाई को समझने के लिए स्वतः स्फूर्त भाव से एक साथ चल पड़े जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद की उस रणनीति का अंग थी जिसके लिए सच्चाई सबसे बड़ा संकट था। लूट का कारोबार सदैव झूठ पर टिका होता है। इस लूट और झूठ के षड्यन्त्र को बेनकाब करने वाली परम्परा को केन्द्र में रखकर हमने अनेक व्याख्यानमालाओं के साथ उसी दौर में एक अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन भी किया। इस संगोष्ठी ने प्रतिबन्ध की राजनीति के उन सन्दर्भों को हमारे सामने रखा जो साम्राज्यवाद की विशाल छाया के अनुरूप सिर्फ एक देश विशेष की परिधि मैं कैद होकर नहीं समझे जा सकते थे।

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