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Premchand Smriti - ank
जैसे-तैसे स्मृति-अंक प्रकाशित हो गया। मैं बीमार अस्पताल में पड़ा था जब जैनेन्द्र कुमार जी ने आकर कहा कि 'हंस' का प्रेमचंद स्मृति-अंक आपको निकालना होगा। समय नहीं था। शक्ति भी नहीं थी पर अनुरोध टाल न सका। स्वीकार कर लिया। पर जो शंका थी वही हुआ। छः महीने से विघ्न-परम्परा घेरे है। अभी तक छुट्टी नहीं पाई है। इसी अवकाश में जैसे बन आया अंक तो निकाल दिया, पर सबसे अधिक खेद की बात यह है कि प्रेमचंद जी की उज्ज्वल कीर्ति की तुलना में यह अंक किसी काम का नहीं हुआ। विशेषकर इसके निकलने में जो इतना अधिक विलम्ब हुआ उसके लिए केवल सम्पादक ही दायी है और इसके लिए 'हंस' के पाठकों से नम्रतापूर्वक क्षमा चाहता है। आशा यही है कि सम्पादक के दोषों का विचार न कर स्वर्गीय प्रेमचंद के नाते इसे हिन्दी-प्रेमी अपनायेंगे ।
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