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Raat Junhiyavari

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2026
9789348650085

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एक लेखक के लिए उसका पाठक, जो सम्बोध्य है, निश्चय ही बड़ा महत्वपूर्ण होता है। हो भी क्यों नः आखिर पाठक के मन को छू लेने में ही किसी रचना की कृतार्थता सिद्ध होती है। पण्डित विद्यानिवास मिथ के व्यक्तिव्यंजक निबन्धों का प्रस्तुत संकलन उनके निबन्धों के एक ऐसे ही संवेदनशील पाठक की सुरुचि की सुखद परिणति है। प्रस्तुत संकलन के गठन का श्रेय श्री गंगा प्रसाद दीक्षित को जाता है जो औपचारिक शिक्षा-दीक्षा से तो प्रयोगशाला में काम करने वाले वैज्ञानिक है, परन्तु स्वाध्याय से विलक्षण साहित्यिक अभिरुचि से सम्पन्न है। दीक्षित जी तीन दशक पहले मिश्र जी के लेखों के सम्पर्क में आकस्मिक रूप से आए और ज्यों ज्यों उनके लेखन को पढ़ा वे उनकी भाषा, शैली, विषय और विवेचन के मुरीद होते गए। वह उनके सहज आकर्षण में बंध गए, और कुछ ऐसे बंधे कि जो भी लेख उनको मिलत्ता उसे पढ़ते और फिर तंजी लेते। इस तरह धीरे-धीरे उनके निकट राष्ट्रीय दैनिक 'नवभारत टाइम्स' में प्रकाशित मिश्र जी के चुनिन्दा लेखों का एक नायाब संकलन उपस्थित हो गया। 'रात जुन्हैयावारी' उसी संकलन की प्रस्तुति है। इस संकलन को प्रस्तुत करते हुए मुझे बड़े हर्ष का अनुभव हो रहा है। मुझे दीक्षित जी जैसे विरल भावग्राही पाठक के बारे में जानकर हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। इस संकलन के सभी निवन्ध मूलतः एक दैनिक समाचार पत्र में व्यापक जन समुदाय के साथ संवाद करने के लिए प्रकाशित हुए थे और बाद में मिश्र जी के विभिन्न संकलनों में भी सम्मिलित हुए थे। इनको पढ़ते हुए हमारे सामने भारत, भारत के समाज और भारतीयता की अनुभूति के कई अनछुए पहलू और आयाम प्रकट होते हैं। इनमें उठाये गये प्रश्न हर भारतवासी के लिए प्रासंगिक है और अपने अन्तसू को टटोलने के लिए प्रेरित करते हैं। वे स्वतन्त्र भारत देश

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