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Samaveshi Aadhunikta Ke Pratiroop
समावेशी आधुनिकता के प्रतिरूप' पुस्तक में वर्मा जी के आठ निबंध संकलित हैं जो भारतीय और पाश्चात्य संदभों में आधुनिकता से संबंधित विभिन्न बहसों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। विभिन्न विचार सरणियों के चिंतकों और साहित्यकारों के अभिमतों की रोशनी में आधुनिकता की जटिल अवधारणा की गिरहें खोलने का प्रयास इन निबंधों में किया गया है। ये निबंध अलग-अलग समय में लिखे जाते रहे हैं। इनका यहाँ एकत्र रूप आधुनिकता की एक मुकम्मल तस्वीर बनाता है। पहले अध्याय के आरंभ में ही वर्मा जी ने एक बुनियादी बहस छेड़ दी है। वह यह कि आधुनिकता को प्रायः पश्चिमी संदर्भों में ही परिभाषित किया जाता रहा है। पूरा पश्चिम भी नहीं, इसके कुछ देशों और उनके साहित्यों तक ही लोगों की दृष्टि सीमित रही है। विश्व के अन्य देशों और विशेषतया भारत के समसामयिक साहित्य के व्यापक परिप्रेक्ष्य में आधुनिकता को जाँचा-परखा जाना चाहिए; क्योंकि हमारी आधुनिकता भारतीय परिस्थितियों की पैदावार है, इसका पश्चिम की आधुनिकता से कोई ख़ास लेना-देना नहीं है। नये विचार और धारणाएँ, वे किसी भी मूल के हों, यदि अपने समय और समाज को ज़्यादा वस्तुपरक ढंग से देखने में सहायक साबित होते हैं तो उनसे असर ग्रहण करना एक स्वाभाविक बात है, लेकिन आधुनिकता के निकष हमारी स्थानीय चिंतन परंपरा की सापेक्षता में तय होना चाहिए। पाश्चात्य दृष्टिकोण को समझने के लिए वर्मा जी ने मुख्यतः आधुनिक काव्य की वृहत्त्रयी डब्ल्यू. बी. एट्स, एज़रा पाउंड और टी.एस. एलियट के साथ-साथ अमरीकी कवि राबिंसन, विटमैन और राबर्ट फ्रास्ट का अनुशीलन प्रस्तुत किया है। जाहिर है इनकी आधुनिकता के मूल में इंग्लैंड और अमरीका की परिस्थितियाँ रही हैं।
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