• New product

Sang-Sath

(0.00) 0 Review(s) 
2026
9789347602689

Select Book Type

Earn 6 reward points on purchase of this book.
In stock

मार्च शुरू ही हुआ था। तब विश्वविद्यालय की एम. ए. की परीक्षाएँ एक निश्चित तारीखा से शुरू होती थीं 12 मार्च। मेथाड्रिन की एक टेबलेट लेकर, देर रात तक पढ़ने के बाद सुबह देर से उठने का दर्रा पड़ा हुआ था। जमीन पर बिस्तर लगाकर लालटेन या लैंप से पढ़ना होता था। सुबह कोई साढ़े नौ बजे का समय रहा होगा। नीचे से दादा की आवाज़ आई, 'लल्लाऽ लल्लाऽऽ!' में उतरकर नीचे पहुंचा तो वे चौके में बैठे ठाकुरजी को नहलवा रहे थे। भाभी चौके में रोटी की तैयारी में थीं। दस से पहले ही वे कचहरी को निकल जाते थे। उनके हाथ में तार था जो उन्हें थोड़ी देर पहले ही मिला था। तार मुरादाबाद से आया था। ठाकुरजी को कपड़े पहनाना रोक कर उन्होंने मुझे चीके के बाहर पास ही बैठ जाने को कहा। फिर वे बोले, 'तुम्हारे ससुर का तार है। उन्होंने शादी कर ली है...' वे अपनी बात पूरी भी नहीं कर सके कि भाभी बोली, 'अब तुमई बताबो जा ब्याह, होय या ना... लेन-देन और दूसरी बातें तो सब गई...' फिर अपना अनुमान बताते हुए वे बोली, 'सौ विसय तो जौ व्याह उनन ने वाई, लड़किनी से करी है गोद में जो टेढ़ी माँग निकाले ही...?' सब कुछ इतना आकस्मिक और अप्रत्याशित था कि कोई भी तत्काल और दोटूक फैसला मुश्किल था। मैंने एक ही बात कही, 'इसमें लड़की का क्या कसूर है? ऐसे किसी फैसले का सारा असर उसी पर पड़ता है... शादी तो कहीं होगी... आगे जैसा आप लोग ठीक समझें...।' गोद भराई की रस्म जून '58 में हुई थी। मैं उसमें नहीं गया था। भाभी का कहना था कि हमारे यहाँ नंगे सिर, बिना मौर का लड़का ससुराल नहीं जाता है। गोद में भाभी-दादा के अलावा मेरी आठ-नौ साल की भांजी शोभा गोरावाली बुआ, पुराने शहर से ओमवती मौसी और दादा की चाची खिड़किया वाली दादी गए थे। लौटने पर दादा-भाभी सन्तुष्ट और प्रसन्न थे। लेन-देन और बात-व्यवहार सबकी उन्होंने

You might also like

Reviews

No Reviews found.