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Tyag Patra : Swaroop Aur Sarokar
साहित्य का एक बड़ा गुण उसका कालजयी स्वरूप है। महान साहित्य चाहे वह किसी भी देश या भाषा का हो काल की सीमा का अतिक्रमण करने में सफल होता है। ऐसा क्यों और कैसे होता है यह शोध का विषय है; परन्तु होता अवश्य है। शायद यही कारण है कि 'क्लासिक साहित्य' की अवधारणा सभी भाषाओं में पाई जाती है। ऐसे साहित्य के पठन-पाठन की सुदीर्घ परम्परा पाई जाती है। और जब पढ़ना-पढ़ाना लंबे समय तक होता है तो पाठ के भी नए नए अर्थ खुलते हैं। इस प्रकार रचना की विकास यात्रा जारी रहती है। यह किसी पाठक के लिए सहज सम्भव नहीं है कि वह विकास यात्रा के इन पड़ावों को एक साथ देख सके। जान सके। समझ सके। ऐसे में एक शिक्षक के रूप में हमारी एक भूमिका यह भी होती है कि ऐसी क्लासिक कृतियों के पाठ की यत्र-तत्र बिखरी सामग्री को संकलित करके पाठकों के समक्ष लाया जा सके। जैनेन्द्र के सुप्रसिद्ध उपन्यास 'त्यागपत्र' के पाठ से जुड़े आलेखों का संकलन-सम्पादन इस दिशा में किया गया एक प्रयास है। यद्यपि ऐसे प्रयास पहले भी हुए हैं; परन्तु जैसा कि देखा गया है समय के साथ पाठ में नए अर्थ खोजने की सम्भावनाएँ बनी रहती हैं एवं यही नए संकलन का औचित्य भी है और सार्थकता भी। यह छोटी सी भूमिका भी इसी दिशा में एक लघु प्रयास है।
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