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Uttal Tarange
डॉ. ओम प्रकाश गुप्त की 'उत्ताल तरंगें' पुस्तक में संकलित कविताएँ कला साधना की निष्पत्तियाँ न होकर समकाल के दबाव से उद्विग्न मनीषा की आकुल अभिव्यक्तियाँ हैं । काव्य संग्रह में संकलित उनकी कविताएँ तीव्र संवेदों से दीप्त भावराशि के सम्प्रेषण के लिए अभिव्यंजक उपकरणों का संधान स्वयं करती हैं । इसमें नियोजित प्रतीक, बिम्ब, अलंकार आदि यथावसर स्वयं ही प्रस्तुत हो गए हैं। उनकी कविताओं की संप्रेष्य वस्तु अधिकतम पूर्णता, प्रामाणिकता और प्रभावान्विति के साथ अभिव्यक्त हुई हैं, आस्तिक आस्था एवं राष्ट्र प्रेम, लोकमंगल, सांस्कृतिक निष्ठा, उदात्त जीवन-मूल्य आदि डॉ.गुप्त की कविता के प्रमुख प्रतिपाद्य हैं। स्वानुभूत यथार्थ डॉ. गुप्त की कविता का केन्द्रीय तत्त्व है । यथार्थ का अभिप्राय यथावत होना ही नहीं, जैसा होना चाहिए (यथा अर्थन्ते) भी होता है। डॉ. गुप्त की दृष्टि में दोनों स्थितियाँ महत्त्वपूर्ण हैं । ये कविताएँ अपने शिल्प - सौष्ठव और वस्तु-विन्यास में युगबोधी चेतना का अभिव्यंजन करती हैं। विश्वास है कि सुधी और सुहृदय पाठक उनका स्वागत करेंगे। बधाइयों और शुभकामनाओं के साथ डॉ. गुप्त से अपेक्षा भी रहेगी कि आप अपनी रचनाओं से साहित्य की श्रीवृद्धि करते रहेंगे... - डॉ. रामजी तिवारी
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