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Aadhunik Hindi Natak Aur Rangmanch
भारतवर्ष में आधुनिक रंगमंच के अन्तर्गत वर्तमान काल का यह रंग-आन्दोलन - नाटककार का रंगमंच में आना, उससे अपने आपको अंगीकृत कराना-पुनसंगठन का यह पहला चरण निश्चय ही इसके महान् भविष्य का साक्षी है, जहां पहली बार सुसंगठित और नियोजित ढंग से, रंगकला के प्रति अटूट निष्ठा लिये हुए नाटककार अपने रंगमंच के साथ एकाकार हुआ। इस मंगल-चरण में नाट्य लेखन की दिशा सहज ही खुलती जाएगी। क्योंकि अब तो रंगयात्री सब एक साथ चल पड़े। दिशा अस्पष्ट रहती है। अलग-अलग चुप बैठे रहने वालों के लिए। सामने का घिरा क्षितिज उन्हें दुनिया की सीमा लगती है पर चलने वालों के सामने दिशा, घिरे क्षितिज में अपने-आप उघरती चलती है। दिशा और अनन्त दिशा ! फिर तो दुर्भाग्य के इतिहास भी सौभाग्य के चरण 'लगने लगते हैं। पश्चिम का सारा आधुनिक रंग-मंच-आन्दोलन, उसकी सीमाएं और उपलब्धियां हमारे सामने हैं। यथार्थवादी रंगमंच, उसका प्रकृतिवादी विकास, जिसमें पश्चिम का नाट्य उन्नीसवीं शताब्दी उत्तरार्द्ध से लेकर बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक भटकता रहा और उसका सारा रंगमंच कार्य यथार्थ, प्रकृतिवाद, 'वेलमेड प्ले' के नाम पर जीवनहीन हो गया। पश्चिम के प्रायः सभी देशों में इस काल का नाटककार वर्ग इब्सन, चेखब और बर्नार्ड शॉ की नाट्यकला से इतनी बुरी तरह से प्रभावित हुआ कि उसके आधुनिक रंगमंच का इतना लम्बा काल श्रेष्ठ रंगमंचीय नाट्य धारा से शून्य हो गया। प्रायः सारे नाटक रंग, कार्य, कथा, कल्पना, काव्य-इन महत्त्वपूर्ण तत्त्वों से शून्य होकर केवल 'मूड', 'विचार' और 'थीसिस प्ले' का साहित्य होकर रह गये 14 जिनमें न रंगमंच का उतना रक्त ही था, न उतनी गति ही थी। फलतः इस लम्बे काल तक पश्चिम का सारा दर्शक वर्ग अपने मनोरंजन के लिए रंगशाला को छोड़कर 'पिक्चर हाउस' में जा बैठा। ठीक यही तो आज भारतवर्ष के दर्शकों की स्थिति है।
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