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Antim Satya ( Ravindranath Thakur )
वर्तमान पुस्तक में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जीवन की अन्तिम 9 महीनों की रचनाओं के अनुवाद का संकलन है। ये रचनाएँ मूल बांग्ला में 'रोगशय्याये', 'आरोग्य, 'जन्मदिने तथा 'शेष लेखा' शीर्षक से परिचित हैं तथा इन चार संकलनों में क्रमशः 39, 33, 29, 15 कविताएँ उपलब्ध हैं। इन रचनाओं को अनुवाद के लिए चुनने का एक ही कारण है। वह उद्देश्य है, जीवन के अन्तिम पड़ाव पर दुरारोग्य व्याधि के आघात को शिरोधार्य कर, जीवन और मृत्यु के बीच खड़े होकर, रवीन्द्र के जीवन दर्शन के प्रवाह की प्रकृति कैसी रही तथा अपनी सर्जना की अन्तिम पंक्तियों में जीवन बोध के किस बिन्दु पर अपने गहन विश्वास के साथ वह किस प्रकार स्थिर रहे उस घटना से हिन्दी भाषा के पाठकों को अनुवाद के माध्यम से परिचित कराना। कवि जीवन की अन्तिम यात्रा से सम्बन्धित इन कविताओं के प्रवाह का सहयात्री बनने के लिए पाठक का सबसे पहले कवि जीवन के उन्मेषकाल के उन विशिष्ट तत्त्वों का एक बार स्मरण करना अत्यावश्यक है जिन्होंने कविमन के निर्माण में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अनेक सदस्यों, आत्मीयजनों से पूर्ण, भाई-बहनों के सान्निध्य से बने हुए सम्भ्रान्त परिवार का कनिष्ठ बालक कभी तो समवेत ऐक्यतान से स्वयं को जुड़ा हुआ पाता तो कभी पैतृक घर के दालानों में उसकी विशाल ड्योढ़ी और बड़े-बड़े कमरों में स्वगत कथन करते हुए जीवन की जाने किन पहेलियों को समझने में लगा होता। शैशव से युवा होते-होते और पारिवारिक दायित्वों की जटिलताओं को बहुत करीब से भोगकर, आहत होते रहने की प्रक्रिया में मृत्यु, विच्छेद और गहन अकेलेपन की शून्यता ने भी कवि की दुनिया को पीड़ा से भर दिया। परम प्रिय आत्मीयजन और प्रियतम सन्तानों की बारम्बार असमय मौत की यन्त्रणा को झेल पाना तो आसान बिल्कुल न था। पर चकित होते हैं यह देखकर, इन वियोग विच्छेद के नकारात्मक रुदन को सृजन की सकारात्मकता से किस तरह कवि ने आनन्दमय शाश्वत प्राणों के छन्द में परिवर्तित कर दिया।'
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