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Diary : Patra/ डायरी : पत्र

Bhagat SIngh Ki Jail Dairy

  • पेपरबैक
  • प्रकाशन वर्ष 2026
  • ISBN 9788168732155
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किताब के बारे में

शहीद भगत सिंह की जेल की नोटबुक एक बहुत ज़रूरी दस्तावेज़ है। यह उनके क्रांतिकारी जोश और जज़्बे का रिकॉर्ड है। यह दिखाता है कि मुश्किल हालात में भी कोई व्यक्ति खुद को बेहतर बनाने का अपना एजेंडा कैसे रख सकता है। याद रखें, यह उनकी 93 दिनों की भूख हड़ताल के बाद मिली जीत की निशानी थी, जिसके दौरान 13 सितंबर, 1929 को शहीद जतिन दास शहीद हो गए थे। यह नोटबुक 12 सितंबर, 1929 को सौंपी गई थी। इसके पहले ही पन्ने पर जीत की घोषणा दर्ज है। वे लिखते हैं, "मेरी ताकत दबे-कुचले लोगों की ताकत है, मेरा साहस हताशा से उपजा साहस है।" एक उर्दू शेर उनके जज़्बे को और भी अच्छी तरह दिखाता है-"कुर्राह-ए-ख़ाक है गर्दिश में तपिश से मेरी मैं वो मजनूँ हूँ जो ज़िंदान में भी आज़ाद रहा" वे लिखते हैं कि प्रकृति में दो तरह की ताकतें होती हैं एक सेंट्रीफ्यूगल (अपकेंद्री) बल जो बाहर की ओर खींचता है, और दूसरा सेंट्रिपेटल (अभिकेंद्री) बल जो अंदर की ओर खींचता है, यानी जोड़ता है। देखिए कि यह राजनीतिक जीवन पर कैसे लागू होता है। सांप्रदायिक ताकतें समाज को तोड़ती हैं और राष्ट्रवादी ताकतें उसे जोड़ती हैं। एक और ज़रूरी बात यह है कि जो नोट्स लिये गए हैं, उन्हें भगत सिंह की जेल में लिखी गई किताबों की रूपरेखा के तौर पर भी पढ़ा जाना चाहिए। खासकर 'साइंस ऑफ़ स्टेट' (राज्य का विज्ञान) शीर्षक वाले नोट्स 'मार्च टू सोशलिज़्म' (समाजवाद की ओर) की रूपरेखा हैं। इसलिए इन नोट्स को उनके क्रम में पढ़ें। खासकर पेज 124 (डायरी) में दिए गए जीवन के मकसद को समझना जरूरी है।

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