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Dalit Aasmita Sarokar Ke Patra

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2025
978-93-48409-40-9

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कभी-कभी पत्र किसी व्यक्ति किसी जाति/ किसी नस्ल की अस्मिता भी बन जाते हैं। पत्र उनकी इज्जत का सवाल बन जाते हैं। इसलिए पहले के दिनों में पत्र सार्वजनिक नहीं हुआ करते थे। पत्रों के लिए सावधानी बरती जाती थी। शुरूआती दौर में पत्रों का विषय प्रेम और व्यथा रहा है। राजाओं के बीच राज्यों की सीमा तथा युद्ध विराम को लेकर भी पत्र लिखे जाते थे। पत्र स्वयं राजा लिखते थे। रानियां भी पत्र लिखती थीं। वान्दियों पर पत्र लिखने की बन्दिशें थीं। हालांकि उसका कारण यह भी था कि वे पढ़ी-लिखी कम होती थी। वैसे कुछ पढ़ना-लिखना सीख जाती थीं। फिर भी उन पर बंदिशे तो थी ही। लेकिन आधुनिक काल में आते-आते जब हम महापुरुषों के जीवन संघर्ष का अध्ययन करते हैं तो उनके पत्रों को पढ़ते हुए उस काल विशेष के बारे में भी पता चलता है। उनके क्रांतिकारी कार्यों के साथ समाज सुधार के लिए उठाए गए कदम हमे प्रेरणा देते हैं। हमारे पत्र मोरपंखी कलम से नहीं लिखे जाते थे। उन दिनों सरकंडे की कलम हुआ करती थी या फिर ब्लैक और ब्ल्यू स्याही वाला पैन। कभी-कभी पेंसिल से भी पत्र लिखे जाते थे। 90 के दशक तक साहित्य के साथ लोगों के जीवन में भी पत्रों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। विष्णु प्रभाकर, कमलेश्वर, नागार्जुन, मुक्तिबोध और फणीश्वर नाथ 'रेणु' के पत्रों की किताबें इस बात की चश्मदीद गवाह रही हैं। सच कहा जाए तो उनकी किताबें ही अब दस्तावेज बन गयी हैं। साथ ही ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के पत्र हमें महसूस कराते हैं कि समाज में दलित/पिछड़ों और महिलाओं की कैसी स्थिति थी। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के महत्वपूर्ण पत्रों को कैसे भुलाया जा सकता है। वे तो दलित अस्मिता के वाहक रहे हैं।

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