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Brahmkamal
आजकल जो नाटक लिखे जा रहे हैं, उन पर कविताओं की तरह बिंबों का प्रभाव ज्यादा देखने को मिलता है। ऐसा नहीं कि नाटकों में बिंवों के लिए कोई निषेध है, मनाही है। कोई भी साहित्य विम्ब, प्रतीक, व्यंजना से परहेज नहीं करता है। लेकिन कोई अगर इनकी ओट में सत्य को ढंकने की कोशिश करता है तो किसी को भी लग सकता है कि रचना के साथ न्याय नहीं हो रहा है। रचना को जिस तरह सामने लाना चाहिए, उस नीयत को अगर छिपाने की कोशिश करें तो किसी को भी उस रचना पर संदेह होने लगता है। रचना ही नहीं, वह रचनाकार भी कहीं न कहीं उस संदेह के दायरे से अपने को बचा नहीं पाता है। लेकिन जब डॉ. सुनील गुलाबसिंग जाधव के अद्यतन पूर्णकालिक नाटक 'ब्रह्मकमल' को पढ़ते हैं तो बिम्ब-प्रतीक्षा-व्यंजना कहीं से अवरोधक साबित होते नहीं दिखते हैं, बल्कि सहयोगी की तरह नाटक को पुख्ता और संप्रेषित रूप में दिखते हैं। लगते ही नहीं हैं कि नाटक से इतर हैं। बल्कि नाटक के कथ्य के साथ-साथ ऐसे ओतप्रोत हैं कि इसी का एक अंतरंग हिस्सा जान पड़ते हैं। नाटक का जो विषय है, बाह्य रूप से बड़ा सहज-सरल और सामान्य-सा दिखता है, लेकिन हकीकत में यह एक ऐसा नाटक है जो सामाजिक समस्या को तो सामने लाता ही है, साथ ही रूढ़ियों पर भी प्रहार करने से चूकता नहीं है।
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