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Hardevi Samagra
हरदेवी का अधिकाँश लेखन गद्य में हुआ है,कुछ कविताएँ , ग़जल और पद के शक्ल में , उनकी गद्य कृतियों में ही आई हैं लेकिन वह उनकी काव्य–प्रतिभा के निदर्शन के लिए पर्याप्त हैं । गद्य में जो बातें तार्किक, विश्लेषणपरक ढंग से रखी गयी हैं उसे कविता में मानो सार–रूप में पकड़ा गया है । लेखिका ने साहित्यिक हिन्दी की सभी प्रयुक्तियों (रेजिस्टर्स)-ब्रजभाषा, खड़ी बोली हिन्दी और उर्दू का गद्य और पद्य दोनों में साधिकार प्रयोग किया है । यह भारतेंदु काल की सामान्य विशेषता कही जा सकती है लेकिन कवयित्री हरदेवी की विशेषता यह है कि वे इसे एक स्त्री–जन्य अनुभव के अभिव्यंजना–विशेष का वाहक बना देती हैं, साथ ही साथ नूतन अंतर्वस्तु के सहारे पारंपरिक रूप का भी पुनराविष्कार करती हैं । उनकी पहली कृति स्त्री विलाप (1881) के भजन की कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं हो प्रभु अब करो पार॥ निरदया हिन्द सिंध में बेड़ा डगमग होत हमार । भारत अविद शशि सम ग्रस्यो,कौन छूटावन हार । काम लहर अति ही नियरानी, छिन छिन होत अपार । क्रोध पवन पल इस्थिर नाहीं, लोभ घुमड़ जल धार । मोह मगर मर्याद छाड़ के, कष्ट दैत नर नार । इत पग ग्रह उत सिन्धु पुकारत, नाव न खैवन हार । माझ धार कहो काहि पुकारें, भई अनाथ एक बार । तुम बिन कौन सहायक स्वामी,जासों करें पुकार । काग जहाजै ठौर न दूजो, देखी आँख पसार । गज गण सुमरत तत्काल है, कष्ट देय निरवार । सो जिय जानि शरण तव लीन्ही, करूणा कर करतार॥
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