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Hariyash Rai : Chuni Hui Kahaniyan
हिंदी कथा-संसार में सैकड़ों कथाकार और इनकी हज़ारों कहानियाँ मौजूद हैं। बावजूद इसके कहानियाँ अब भी अविराम लिखी जा रही हैं। इसलिए कि हमारा 'देश-काल' बिना ठहरे निरंतर गतिमान है। सामान्य जनता गति की इस निरंतरता में अपनी विविध परंपराओं, प्रथाओं, मूल्यों, मान्यताओं, आदर्शों और नाना विश्वासों-अंधविश्वासों आदि की डोर थामे ऐतिहासिक बदलावों और ठहरावों को जीती चली जाती है। लेकिन साहित्य का 'सर्जक' अपने वक़्त के बदलावों और ठहरावों को सिर्फ जीता ही नहीं है बल्कि उसकी शिनाख्त भी करता है और अपने रचनात्मक कौशल से उसे मैग्नीफाइंग करके पाठक के सामने भी ले आता है। रचनाकार के सामने उसके 'वर्तमान' के एक छोर पर अतीत और दूसरे छोर पर भविष्य होता है। वह इन दो छोरों के बीच फैले तनाव में अवस्थित होता है। रचनाकार की दुनिया का यथार्थ अनेक जटिल और बहुआयामी विचारों, अनुभवों, घटनाओं और संकटों से भरा होता है। एक संजीदा कथाकार यथार्थ की इसी ज़मीन पर अपने कथानक के ताने-बाने बुनता है। कई बार एक ही देश-काल-परिस्थिति में सृजनरत दो कथाकारों के कथानक एक-दूसरे से जुदा बल्कि विपरीत भी होते हैं। यह कथाकार के ऐतिहासिक दृष्टिकोण, उसकी वर्गीय चेतना और राजनीतिक-वैचारिक प्रतिबद्धता पर निर्भर होता है। कहना न होगा कि बीसवीं सदी के बनारस में एक ही देश-काल-परिस्थिति में रहते हुए अपनी कहानियों के जैसे कथानक प्रेमचंद को दिखाई देते थे, वैसे जयशंकर प्रसाद को नहीं।
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