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Hindi Sahitya Ka Lok Sandarbh
लोक साहित्य कभी लोक तक ही सीमित था। साहित्य में इसे अधिक महत्ता प्राप्त नहीं थी। आज अध्येताओं का ध्यान इस ओर गया है तो लोक साहित्य पर खूब अध्ययन भी हो रहे हैं और उससे सम्बन्धित नये-नये पक्ष उद्घाटित भी हो रहे हैं। लोक साहित्य में लोकगीत अधिक गतिशील होते हैं, समसामयिक होते हैं। संरचना में भले छोटे हों, पर प्रभावात्मकता में ये बड़े होते हैं और त्वरित सन्देश छोड़ते हैं। ये समय के साथ चलते हैं और समसामयिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में लोक को शिक्षित, संस्कारित और प्रेरित करने में अपनी बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसलिये राष्ट्रीयता की भावना से लेकर प्रगतिशील चेतना तक इनमें दिखायी पड़ती है। इसी तरह लोककलाएं-उपयोगी और ललित, दोनों प्रकार की कलाएं कुछ-कुछ सभी को आती ही थीं। यह हमारे स्वावलम्बी जीवन के लिये आवश्यक था। इससे हमारा सौन्दर्यबोध भी विकसित होता था और जीवन की आवश्यकता भी पूरी होती थी। शिक्षा और संस्कार दोनों की प्राप्ति हमें लोककलाओं से होती थी। आज हम इनमें बहुत पिछड़ गये हैं। अब शहरों में तो दूर, गाँवों में भी इनसे जुड़ाव निरन्तर कम होता जा रहा है। पुस्तक में इन विषयों से सम्बन्धित विचार भी व्यक्त किये गये हैं। महादेवी वर्मा और अज्ञेय के काव्य से सम्बन्धित लेखों में भी लोक-परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखा गया है। भक्तिकालीन कवियों का सन्त एवं भक्त की श्रेणियों में मनमाना वर्गीकरण कर आधुनिक आलोचना ने इस विषय को विवादास्पद-सा बना दिया है। जबकि न शास्त्र ऐसा मानता है और न लोक। सबसे बड़ी बात यह कि स्वयं उन कवियों ने भी अपने को उस रूप में प्रस्तुत नहीं किया, जैसा आज के विद्वानों ने कर लिया है। पुस्तक का प्रारम्भ इसी विषय से हुआ है, जिसमें शास्त्रमत और लोकमत दोनों दृष्टियों से इस सन्दर्भ में सही स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। आशा है, समग्र रूप में पुस्तक में प्रस्तुत विचार-सामग्री पाठकों को विभिन्न विषयों के प्रति कुछ भिन्न दृष्टि से सोचने-विचारने के लिये प्रेरित कर सकेगी।
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