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Mannu Bhandari : Chuni hui kahaniyan
मन्नू जी की अधिकांश कहानियां उनके अपने निजी जीवन का बेहद खूबसूरत और पैना रचनात्मक कैथारसिस है। अपने जीवन की विकट स्थितियों को कलम की नोक पर लाकर झेल ले जाने का अद्भुत कौशल मन्नू जी ने शुरू से ही साध लिया था। साहित्य और कला में ऐसी ताकत होती है कि सर्जक अगर उसमें पूरी तरह डूब जाए तो अपने जीवन की त्रासदियों से जूझने का हौसला उसमें बखूबी पैदा हो जाता है। इसीलिये जीवन की वे स्थितियां जो किसी भी एकनिष्ठ और समर्पित पत्नी को तोड़ कर रख दें, उन्हें उस हद तक नेस्तनाबूद नहीं कर पाई। उन स्थितियों और उनसे जन्मे आघातों का एक निरपेक्ष दृष्टि से आकलन कर उन्होंने बेहद संयम और कुशलता के साथ कुछ अविस्मरणीय कहानियां रच डालीं। सृजन के इस संतोष ने बाद के सालों में इतनी तटस्थता और दूरदर्शिता भी पैदा की कि वे उन स्थितियों का मखौल उड़ाते हुए, एक चुभने वाली व्यंग्यात्मक कहानी लिखने में भी समर्थ रहीं- 'स्त्री सुबोधिनी' (1977)। मन्नू जी की एक और कहानी 'करतूते मरदाँ' (2002) तो उनके कहानी लेखन के धारदार शिल्प का अप्रतिम और बेजोड़ नमूना है जिसमें व्यंग्य कुछ ज़्यादा ही तीखा और तंज कुछ ज़्यादा नुकीला होकर सामने आ गया है। 1984 में जब मैंने कलकत्ता दूरदर्शन के लिए मन्नू जी का साक्षात्कार लिया था तो उनसे एक सवाल पूछा था- "क्या कारण है कि आपकी नायिकाएं त्रासदी से गुजरती हैं तो भी समझौता करती दिखाई देती हैं या अपने जीवन की विसंगतियों को पहचान तो लेती हैं पर विद्रोह नहीं करतीं" तो उन्होंने फौरन उत्तर दिया था-"यह बताओ, हमारे भारतीय समाज में कितनी औरतें हैं जो विद्रोह का झंडा हाथ में लेकर बगावत पर उतर आती हैं? जब जीवन में यह नहीं होता तो कहानी में हम ऐसा होते हुए कैसे दिखा सकते हैं।" आज मन्नू जी की उस तत्काल प्रतिक्रिया को याद करते हुए डॉ. आंबेडकर का वक्तव्य याद आता है कि शोषित को शोषण की पहचान करवाना जरूरी है, विद्रोह करना तो वह अपने आप सीख जाएगा।
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