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Patkatha Lekhan
पटकथा लेखन दीगर विधाओं से जुदा और कठिन कर्म है। दरअसल यह किसी विधा विशेष से हटकर स्वतंत्र लेखन है। इस लेखकीय कर्म में कृति के पूर्व विजुअलाइजेशन की सृजनात्मक लेखकीय क्षमता प्रमुख होती है। निर्देशक की मांग के अनुसार इसका जन्म होता है। वह एक फ़िल्म निर्माण के वास्ते पटकथा लेखक से स्टोरी आइडिया से लेकर दृश्यों में विकसित पूरी कथा संरचना मांग सकता है। ऐसा भी होता है कथा का विकसन निर्देशक पटकथाकार के साथ मिलकर करे। यह भी होता है कि वह दी गयी पटकथा के ढांचे में रक्त, मांस मज्जा, त्वचा, सांस, दिल और रूह अपने हिसाब से काग़ज़ या दिमाग़ में अभिकल्पित करे या करवाये। यह बात तय है कि बेहतर पटकथा कौशल के लिए सलीम-जावेद, मनोहर श्याम जोशी, कमलेश्वर आदि की तरह कथा संवेदना ज़रूरी है। पटकथा लेखक के पास एक कमर्शियल और सृजनशील स्पाट से लेकर वृत्त चित्र और फ़िल्म लेखन की क्षमता होनी चाहिए। बेशक फ़िल्म निर्देशक का मीडियम है लेकिन फ़िल्म का पहला विजुअलाइजेशन पटकथा लेखक का होता है। प्रभुनाथसिंह आज़मी अपने समय के एक चर्चित कथाकार रहे हैं। साहित्य में वे शायरी के साथ आए और कथाकार के रूप में चर्चित हुए। दुर्भाग्य से उन्हें लंबी उम्र न मिली। उनकी इस किताब में स्पाट, डाक्यूमेंट्री और फ़िल्म की संपूर्ण पटकथाएँ हैं।... पटकथा के क्षेत्र में आने वाले नये लेखकों और मीडिया संस्थानों के लिए यह आदर्श किताब की तरह उपयोगी है। यह सिर्फ़ प्रत्येक पटकथा के उदाहरण प्रस्तुत नहीं करती अपितु उसके लेखन की अवधारणा, कथा वस्तुओं की आधार भूमि, सांकेतिक पटकथा से लेकर संपूर्ण पटकथाओं को सोदाहरण प्रस्तुत करते हुए, रचना प्रक्रिया के सूत्रों को भी प्रकाशित करती है। किताब में नये फ़िल्म निर्माताओं के लिए, दृश्य दर दृश्य विकसित कथा में सिनेमेटोग्राफी व पार्श्व संगीत के संकेत और नरेशन भी दिये गये हैं। फ़िल्म की दृष्टि से संवाद के अनेक उदाहरण किताब में हैं। ये किताब पटकथा लेखन के सभी अपेक्षित आयामों को उद्घाटित करती है।
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