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Purushottam Agrawal : Pratinidhi Nibandh
पुरुषोत्तम अग्रवाल के लेखन का उद्देश्य सभ्यतामूलक जिज्ञासा, सभ्यता के पाठ का पुनर्लेखन, और सांस्कृतिक शक्ति-विमर्श में हस्तक्षेप रहा है। इसलिए उसका चरित्र बौद्धिक और अन्तरानुशासनात्मक है। उन्होंने अपने लेखन में भारतीय समाज और संस्कृति के तमाम मुद्दों और प्रश्नों को समाविष्ट किया है। उनके लिए साहित्य के किसी भी गम्भीर पाठ की अनिवार्य परिणति संस्कृति और सभ्यता की समीक्षा के रूप में होती है। सार्वभौमिक मानवीय संवेदना और दृष्टि के साथ उन्होंने अपने समय के अतीत और भविष्य के नैरंतर्य में संस्कृति की शाश्वत समस्याओं पर साहसपूर्वक विचार किया है। ऐसे में स्वाभाविक है कि उनका लेखन केवल साहित्य केंद्रित नहीं है। साहित्यिक लेखन में भी गहरी राजनीतिक समझ, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक सरोकार हैं। देशी-विदेशी वैचारिक प्रगति के परिप्रेक्ष्य में हिंदी लोकवृत्त के ज्ञान और संवेदना की श्रमसाध्य मीमांसा उनके लेखन का केंद्रीय कथ्य है। इसलिए उनके लेखन का अर्धांश एक ऐसे बुद्धिजीवी का लेखन है जो अपने समय की उलझनों और चुनौतियों से टकराने में सन्नद्ध रहता है। शोध के दौरान मुझे अखबारों और पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके तमाम ऐसे लेख मिले जो सामयिक घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने के उपक्रम में बने थे। ये लेख परिमाण और गुणवत्ता में इतना बड़ा आयतन घेरते हैं कि यदि ये पुस्तकाकार प्रकाश में आएं तो केवल इन्हीं के बल पर पुरुषोत्तम अग्रवाल की अविस्मरणीय जगह बनती है। बहरहाल, हमें पुस्तक की परिकल्पना के अनुरूप उनकी साहित्यिक आलोचना पर ध्यान केंद्रित करना है।
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