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Rangmanch Aur Natak Ki Bhumika
प्रस्तुत पुस्तक में मूलरूप से रंगमंच की निश्चित अवधारणा पर विशेष बल दिया गया है। सारा अध्ययन, रंगमंच के ही परिप्रेक्ष्य में किया गया है। भारतवर्ष में, विशेषकर हिन्दी में नाटक का अध्ययन अभी तक केवल काव्य तथा साहित्य स्तर पर ही होता रहा है। इस कारण भी 'रंगमंच' की दृष्टि का अभाव सदा बना रहा है। इस तरह रंगमंच के व्यापक और गहन स्तर से ही इस पुस्तक की कल्पना तथा संरचना की गयी है। पाश्चात्य देशों में प्राचीन और मध्ययुगीन नाटक, रंगमंचीय कार्यकलाप, नाट्य-प्रयोग का महत् अध्ययन उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक से ही 'रंगमंच' के परिप्रेक्ष्य में होने लगा था। भारतवर्ष में अनेक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों के फलस्वरूप इस रंगमंच-दृष्टि का सर्वथा अभाव बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक रहा है। अपनी प्राचीन नाट्य-निधि तथा रंग-क्रियाकलाप का रंगमंच के स्तर पर समुचित अध्ययन स्वातन्त्र्योत्तर भारतवर्ष की देन है। जबकि इस देश की चेतना प्रायः एक युग बाद गंभीर रूप से व्यावहारिक रंगमंच-क्षेत्र में कार्यरत हुई है। जबकि आधुनिक रंगमंच - अन्वेषण में स्वभावतः इस जागरण को (चेतना) अपनी प्राचीन, शास्त्रीय और लोक, पूर्व और पश्चिम-इस सब नाट्य-सामग्री तथा रंग-क्रियाकलापों के वास्तविक अध्ययन और उन सब में व्याप्त निश्चित रंगमंच के रूप तथा प्रकृति को समझने और ग्रहण करने की अपरिहार्य आवश्यकता पड़ी। इस संदर्भ में यह भी सच है, कि इस रंगमंच अन्वेषण का कार्य वही कर सकता है जो व्यावहारिक रंगमंच में एक सजग, सचेत कार्यकर्ता के व्यक्तित्व को सतत जी रहा है। या जो उस महत् व्यक्तित्व को जीने की कामना करता है। वरना केवल बुद्धि द्वारा किसी भी देश, युग, प्रकृति के नाटक और रंगमंच को पूर्ण रूप से न समझा ही जा सकता है, न ग्रहण ही किया जा सकता है।
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