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Tamanna Ka Dusra Qadam

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2025
978-93-48650-06-1

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इस किताब की शुरुआत कविता पर एक वक्तव्य से होने का कोई खास कारण नहीं है सिवा इसके कि यह एक कवि का गद्य है। हमारे समय में विधाओं की पारम्परिक संरचनाएँ या तो टूट रही हैं या लगभग ध्वस्त हो गयी हैं। इन बदलावों को और उनके कारणों को समझना चाहे बहुत आसान न हो, लेकिन इतना कठिन भी नहीं है कि कुछ समझा ही न जा सके। सिर्फ शिल्प या भाषा या वाक्य की संरचना ही नहीं बदल रही है, नयी प्रौद्योगिकी ने विचार और संवेदना के तारों को भी झकझोर दिया है। इसमें कुछ अलग करने की प्रयोगधर्मिता से ज्यादा बेचैनी है। अराजकता और अमूर्तता भी। मुझे महसूस होता है कि कथेतर गद्य शायद अभिव्यक्ति के लिए ज्यादा विश्वसनीय हो गया है। यह रचनाकार को अधिक स्वतंत्रता देता है। हमारे समय में हो रहे बदलावों को रचने के लिए अधिक उन्मुक्त करता है। यह शायद निबन्ध के पुनर्वास का समय है। एक नये रूप में, नयी ठब में निबन्ध की वापसी का समय। इसे 'कथेतर' कहने का मतलब यह नहीं है कि यह कथा-तत्त्व से पूरी तरह मुक्त है। साहित्य की कोई भी विधा कथा से पूरी तरह कभी मुक्त नहीं होती। यह वस्तुतः ऐसा निर्बन्ध गद्य है जिसमें साहित्य की सभी विधाओं की आवाजाही बनी रहती है। यह किताब गाहे-बगाहे लिखे गये ऐसे ही गद्य का संकलन है। यह सिर्फ साहित्यिक सवालों तक महदूद नहीं है, इसमें आसपास के जीवन के अनेकों सवालों को समझने की कोशिश है। यात्राओं की डायरियाँ हैं। कई रचनाकारों और पुरानी किताबों की याद है। कई बहसों में हस्तक्षेप करने की कोशिश है। यह कुछ बिखरे हुए गद्य को समेट कर एक शक्ल देने की कोशिश है।

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