- New product
Tulsidas (Chandrabali Pandey)
तुलसी के अध्ययन की बात मन में कब बसी इसे ठीक ठीक नहीं कह सकता। तो भी इतना तो जानता ही हूँ कि बचपन में ही इसका सूत्रपात हो गया था। गाँव के बूढ़ों को अँगुली से टो टो कर जब रामचरितमानस को पढ़ते देखता तो अपने मन में भी कुछ ऐसा ही करने की भावना होती। कुछ पढ़ लिख जाने पर देखता क्या हूँ कि कुछ अहीर के बालक भी इसी लालच से एक सज्जन के पास 'ककहरा' सीखने आते और रात में घंटे दो घंटे अपना समय अ आ और क ख में लगाते। और सयाना होकर तुलसी के गुणगान में लगा तो, पर उसकी सच्ची छाप उस दिन स्वर्गीय आचार्य पंडित रामचंद्र शुक्ल से सुना यह कि जी में होता है कि अवसर प्राप्त करने पर चित्रकूट में रहूँ और संध्या समय 'रामचरितमानस' की कथा कहूँ-व्यासों की भाँति नहीं, सीधे सीधे शब्दों में 'मानस' का मर्म समझाने के लिए। इतने दिन बीत गए पर तुलसी के अध्ययन की साथ पूरी न हुई। पढ़ने का अवसर भी इतना न मिला कि कुछ ठौर ठिकाने से लिखता और किसी प्रकार मन को संतोष देता। यदा कदा कुछ अवलोकन करते रहते तथा लुक-छिप कर विद्यार्थियों के पूछते रहते, का परिणाम उन्हीं के हित से जनता के सामने है। इसकी समय-समय पर जो प्रेरणा श्रीरामबहोरी शुक्ल की ओर से मिली है उसके उल्लेख की आवश्यकता नहीं, पर श्रीज्ञानबती त्रिवेदीजी की लेखनी ने जो काम किया है उसकी उपेक्षा नहीं हो सकती। वास्तव में यह उन्हीं के हाथ का प्रसाद है जो तुलसी की उपासना में बँटा है। यदि उनका हाथ मेरी वाणी को रूप न देता तो यह 'तुलसीदास' भी आपके सामने न होता।
You might also like
No Reviews found.