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Vichar-Vimarsh
'विचार-विमर्श' की रचना सचमुच विचार के हेतु ही हुई है। इसमें अनेक बातें ऐसी आ गई हैं जिन पर विचार करना विद्वानों का धर्म है। पहले कुल सात लेख लिखने का विचार था पर वन सके हिन्दी सम्बन्धी केवल पाँच ही। अच्छा होता यदि इसमें 'विद्यापति का मधुर रस' और 'सूरदास का रहस्यवाद' भी आ गया होता पर जो बना नहीं वह आता कैसे और यदि बन भी जाता तो आने को स्थान कहाँ मिलता ! कागद तो था नहीं। प्रकाशक पाठ्यपुस्तक चाहते हैं 'विमर्श' नहीं। तो क्या इस 'विमर्श' में पाठ्य नाम की कोई सामग्री नहीं! अजी कहाँ की बात करते हो? कबीर, मीरा, जायसी और नाभादास में यदि पाठ्य की सामग्री नहीं है तो कहाँ है जो इस प्रकार दूह बाँधते हो! 'वैष्णवन की वार्ता' का किस पाठ्यक्रम से सम्बन्ध नहीं जो इस 'विमश' की उपेक्षा कर रहे हो? करो पर इतना भूल न जाओ कि हिन्दी का क्षेत्र पाठ्यक्रम के बन्द कमरों में नहीं प्रशस्त आर्यावर्त में है और है इस देश के बाहर विशाल भारत तथा विदेश में भी। नहीं, वह समय आ गया है कि हम अपनी पाठ्यपुस्तकों की सुधि लें और पाठ्यजीवियों से हिन्दी का उद्धार करें। अन्यथा सब स्वाहा। हाँ, चलते-चलते एक बात और सामने आ गई। पाठ्य-पुस्तकों का यत्र-तत्र हिन्दी साहित्य के विवेचनात्मक इतिहासों में भी भक्तमाल का समय संवत् 1642 दिया जाता है जो किसी भी दशा में ठीक नहीं। स्वयं भक्तमाल में ऐसे प्रमाण प्रचुर मात्रा में हैं जिनसे उसका रचना-काल संवत् 1700 के आसपास ठहरता है। भक्तमाल के समुचित सम्पादन की कितनी आवश्यकता है इसका यदि कुछ ज्ञान इस 'विचार-विमर्श' के द्वारा हो सका तो लेखक का श्रम सफल ठहरा अन्यथा पानी पीटना और जंगल में ढोल बजाना भी तो किसी का काम होता है इसे भी वैसा ही समझ लें।
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