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Bavan Nadiyo Ka Sangam

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2026
9788199936331

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किताब से लिए कुछ अंश पहली की जगह तीसरी सितम्बर को भी रामेसर नहीं दिखा तो गुलाव बाई ने बनवारी से चिंता प्रकट की "न रामेसर आया, न तीन-चार दिन से शशी मास्टर ही आया है। बीच में भी कभी-कभार ही आता रहा। कहता था-यहाँ के कई लोग हमारे पीछे पड़े हैं। कहीं तबादला न हो जाय। बता रहा था कि हमरा अंटरमू किसी रिसाले में भेजे है। हमने कंचन की बाबत पूछा तो कहने लगा, पढ़ने में अच्छी है और जैसे में रहती है, भीतर-भीतर किनारे है। आपने इसे कीचड़ में का कमल कर रखा है। हमने कहा कि भइया, कब तक ।.... तुम्हारा जी कैसा है अब ? जिद पर न रहो। हमरे साथ चले चलो मेडीकल आजकल में ही...." "सच पूछो तो मेडीकल कराने की अब हिम्मत नहीं रही। कब एक्सरे कराये घे, साल-भर पहले ? तब से हकीमी-बैदकी-होमोपैथी में समय काटते चले गये। बीमारी भी ससुरी ऐसी कि आँख से दिखे नहीं। कभी लगे कि बस, यही आखिरी साँस है। कभी ठीक-ठीक चलती रहती है। उस दिन देखो कि बेहोश हो गये। पहले न किनारे से लग जाते, जरूर किसी ट्रक-गाड़ी के आगे गिरते। आज तो ठीक है जी। हम ऐसा करते हैं, ममफोरडगंज हो आते हैं। आज इतवार है, मास्टर की भी छुट्टी होगी ।" बनवारी चलने को हुआ कि गुलाब बाई ने रुकने का इशारा किया दस का नोट देती बोली - "साइकिल यहीं छोड़ देना। हम भी जरा शहनाज के हो आयें। वक्त का कुछ ठिकाना नहीं रह गया। सोचती हैं, इन पहाड़नों को किनारे कर दें। लगी जमा दे दें शहनाज... मुन्नी से तो बात करने को जी नहीं रहा। हमारा तो जी दिन-दिन उचाट होता जाता है। कंचन मार जान खाये जाती है कि राधेश्याम भइया यो जो चिट्ठी लिखवाती हो, सो फड़वा देती हो। तीसरा महीना लगा बुंदू मियाँ को आये गये। सौ रुपये उन्हीं के हाथ भिजवाये थे।

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