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Bhage Hue Log
किताब से कुछ अंश अनुराधा डॉक्टरनी घर से चली आई थी-महाकालेश्वर मन्दिर जाने के लिए। मोड़ पर ही डाकिया मिल गया- "डॉक्टरनी साहिबा, आपकी चिट्ठी है।" रविवार है, छुट्टी का दिन। अनुराधा डॉक्टरनी के विस्मय को, शायद, डाकिया समझ गया। चिट्ठी आगे बढ़ाते हुए, बोला- "यहाँ दस्तखत कर दीजिए लिस्ट में। 'स्पीड पोस्ट' है।" डाकिया चला गया, तो पहले डॉक्टरनी ने दूसरी तरफ पता देखा-सी. प्रकाश, एम.बी.बी.एस., थर्ड इयर, किंग्स मेडिकल कॉलेज, लखनऊ। कुछ देर तक अनुराधा डॉक्टरनी सड़क के बीच में ही खड़ी रह गई। आज चार वर्षों के बाद एकाएक चन्द्रप्रकाश का पत्र। कहीं इस पत्र में भी वैसी ही बातें तो नहीं लिखी हैं, जैसी आज से चार वर्ष पूर्व एक छोटे से कागज में लिखकर, वह घर से चला गया था और कागज अनुराधा डॉक्टरनी की मेज पर रखे 'स्टेथोस्कोप' के नीचे दबा गया था... 'मैं स्वीकार करता हूँ कि एक औरत के नाते तुम, कम-से-कम मेरे लिए महान हो ।... मगर इसके बावजूद...' ऐसी ही अनेक पक्तियाँ जैसे आज तक अनुराधा डॉक्टरनी की आत्मा में धँसी हुई हैं। उस दिन भी लगा था, जैसे ये सारे शब्द कागज पर नहीं लिखे गए हैं, मेज पर खोदे गए हैं, और सिर्फ़ उनका अर्थ मेज पर रखे हुए कागज में उभर आया है-'बट स्टिल इट्स इम्पॉसिबिल फॉर मी...'
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