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Chithirsen

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2026
9788169966009

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चिट्ठी के चार आँखर अपनी पत्नी या प्रेमिका के लिए भी 'सस्ती सिरी सरवोपमा' से पत्र-लेखन आरम्भकरने वाले ठेठ पहाड़ियों की न-जाने कितनी चिड्डियाँ पढ़ने-सुनने और लिखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। कई एक पत्र पहाड़नों के परदेश गए बेटे या पतियों के नाम के भी पढ़े-लिखे हैं, जिनमें पहाड़नों का स्नेहावेग और स्मृतियों की विहलता से हिलुरता हिया अँगूठों की छापों की तरह उतर आता था। आज भी उन पत्रों की आत्मा जैसे मेरे मन-मस्तिष्क की गहरी घाटियों में पहाड़ी नदियों के गंगलोढ़ों-पत्थरों की चौकी पर से बिछुलते-बहते पानी की तरह छुलुक-छुलुक करती रहती है। मैं स्वयम् ठेठ पहाड़ी हूँ, सो परदेश की नौकरी में गए बेटों-पतियों वाली पहाड़नों का हिया प्यार से हिलुरता है, टीस से कसमसाता है और वो ऊँचे टीलों पर खड़ी, सड़कों पर चलते मुसाफिरों को देख-देखकर अपनों की स्मृति से गद्गदा उठती हैं, गाँव की ओर आते चिट्ठीरसैन को देखते ही उनकी सिर-घरी गागरियाँ छलछलाने लगती हैं, हाथ थमे मूसल-कुटल जल्दी-जल्दी चलने लगते हैं, तो मेरे सजातीय-संस्कारों को उनके मन की संक्रामक-कसक और विह्नलता व्याप ही जाती है। 1958 में पहली बार मैंने 'पोस्टमैन' कहानी लिखी थी। पूना में बड़े भाई श्री जंगबहादुरसिंह जी के पास ग्राए पुष्कर मामू के एक पोस्टकार्ड से प्रेरणा लेकर, जिस अकेले पोस्टकार्ड में पाँच या छह बार 'बाँकी क्या लिखूँ, आप खुद समझदार हैं।' वाक्य आया था! पत्र आरम्भ ही यों किया गया था, कि 'सस्ती सिरी प्रिय भानिज जंग को उनके मैं पुष्कर मामू की आशीस बार-बार पहुँचे। बाँकी क्या लिखूँ, आप खुद समझदार हैं। यहाँ आजकल मौसम ठीक-ठाक ही चल रहा है। छोटी-सी दुकानदारी ठहरी, जैसे-तैसे चलानी ठहरी। उपन्यास की एक कहानी से कुछ अंश

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