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Maya Sarovar
वातावरण में काफी धुन्ध है और कुछ नमी भी। होटल के इस ओर के सभी कमरों का रुख झील की ओर है। सामने किसी रंगमंच के पर्दे की तरह खिंचे रहने वाले, झील के इस परिदृश्य का अब इतना अभ्यस्त हुआ जा चुका है कि दरवाजे खिडकियाँ बन्द रहने पर भी, महसूस होता रहता है। आज का दिन-भर का वक्त ढलान पर बहते सोते के किसी गड्ढे में एकत्र होते जल की तरह था और उसका बीत चुकना अब मिसेज़ खोसला की स्मृति में था- लगातार इकट्ठा और घनीभूत होता हुआ। चीना पीक से यहाँ तक की ढाल उतरते-उतरते मिसेज़ खोसला इतना थक चुकी थीं कि दरवाज़ा खोल, अन्दर घुसकर धप्प से आरामकुर्सी पर पसर जाना, बोझ की तरह कन्धों पर लदी थकान का उतर जाना हुआ। एकाएक उन्हें उन दिनों की स्मृति हो आई, जब वो यूनिवर्सिटी मैं पढ़ा करती थीं और खेल-कूद में हिस्सा लेते हुए दौड़ना, उछलना-कूदना हुआ करता था। बाँहें ऊपर उठाते हुए थकान उतारने की मुद्रा में होते ही, अपने ही शरीर में से स्फटिक मणियों की तरह उजागर होते, अपने स्त्रीत्व के प्रति एकाएक का सावधान होना-सावधान और रोमांचित-अभी तक स्मृति में है और कौंधता है।
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