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Jaltarang
किताब से कुछ अंश लौटते समय नीचे शहर की ओर उतरते हुए दोनों फिर उसी सोते के पास से गुजरे और अंज्रियों में भर-भरकर पानी पिया। एक अंजी अपना जूठा पानी २६ उसने मिसेज खोसला की तरफ बढ़ाया, तो उन्होंने चुपचाप पी लिया। फिर आंखें गड़ाकर बी. के. को देखती रहीं और फिर खिलखिलाती हुई उठ खड़ी हुईं, "लो, मुस्लिम शरीयत के तहत, हम दोनों 'हम-मजहब' हो चुके!” "मिसेज खोसला ! उतनी गम्भीर बातों के बाद एकाएक आपके चेहरे का इतना खिल आना-झील की सतह पर फैलते हुए कमल के फूल की तरह...।" "बस, बी. के., ज्यादा बटरिंग न करो। मुझे गालिब का वह शे'र याद आ रहा है कि हमें मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन... बी. के., वास्तविकता को जितने खांटी तौर पर तौलने की शक्ति हम औरतों में होती है, शायद तुम लोगों में नहीं होगी। इसीलिए प्रेम-प्रेम की 'ट्रेजिडी' में से जितनी जल्दी कोई औरत अपने-आपको उबार ले जाती है, वह सब किसी पुरुष के लिए सम्भव नहीं। लो, मैं फिर बहकने लग गई हूं। मैं तुमसे कहना यह चाह रही थी, किसी भी औरत के लिए अपनी बढ़ती हुई उम्र को 'कम्पेन्सेट' करने के लिए बच्चों से ज्यादा कारगर और कुछ नहीं होता। बच्चे हों, तो औरत की बढ़ती हुई उम्र, उसका ढलता और बुझता हुआ शरीर-सब-कुछ 'जस्टीफाई' हो जाते हैं। मगर जब कोई औरत बिना बच्चों के ही बुढ़ाने लगती है बी. के., तब उसे एक अमूर्त-सा भय दबोचता चला जाता है।... मुझे लगता है कि इस भय का अहसास मुझमें भी शुरू हो चुका है। और देखो, तुम तो बहुत भले हो। बुरा मत मानना, मैं यह कहूं कि अगर मैं ज्यादा बुढ़िया हो चुकी होती, मेरे शरीर में कोई आकर्षण नहीं होता, तो शायद, तुम इतनी दूर और इतनी देर तक मेरा साथ नहीं दे पाते।" "और मिसेज खोसला, अगर यही बात मैं भी कहूं, तो!"
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