• New product

Ek Mooth Sarson

(0.00) 0 Review(s) 
2026
9788168653412

Select Book Type

Earn 3 reward points on purchase of this book.
In stock

किताब से कुछ अंश फालसीमा गाँव नीचे की ओर छूट गया था। ऊपर की ओर सिन्तोला वन फैला हुआ था। पश्चिम दिशा की ओर टिपुड़ी का टी. बी. सेनीटोरियम दिखाई दे रहा था और गाड़ी की सड़क से लगी हुई दो-चार दुकानें। उमेदसिंह की चाय की दुकान भी दिखाई दे रही थी। उस तरफ को देखने से देवकी की आँखें दुखने लगीं, तो पूरब दिशा की ओर पलट गई। डिनाकी गोल्ल के मन्दिर की सीध में, दूर-दूर तक, ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ दिखाई दे रही थीं, घने-घने जंगल और अनेकों पहाड़ी गाँव दिखाई दे रहे थे।... मगर देवकी को अपना चनोली गाँव नहीं दिखाई दे रहा था। दिखाई दे रही थी, डालाकोट की ओर डूंगरी गाँव के सिरहाने फैली हुई ऊँची सेलना पहाड़ी। और... और देवकी को उदेख-जैसा लग रहा था। मायके की ठौर आँखों में उतर रही थी। और... दिगौ, सेलनाधार की पल्ली काँख में ही चनोली गाँव पड़ता है।... और... पापी पेट का परबत भी ऊँचा हो गया है। चढ़ाई चढ़कर आने से, छाती फूलती ही चली गई थी, हरेक साँस धुक्-धुक्-धुक्-धुक् करती, मन की ठौर को आँखों में उतार रही है। लोक-कथा की रुपुली घुघुती का घोंसला देवकी की कोख में उतर गया है। सफेद मोती का दाना अण्डाकार होता चला आया था, दिन पर दिन। अब उसे जैसे रुपुली घुघुती के रेशम से भी मुलायम उदर-लोमों की निमैली छाँव लग गई है। देबुली की कोख में अण्डाकार मोती ठौर पा गया था। अब चित्तरलेखा परी ने उसमें रुपुली घुघुती के घोंसले में जन्मे सोनपंख की जैसी छवि उभार दी होगी...

You might also like

Reviews

No Reviews found.