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Chouthi Muthi

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2026
9788199936317

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किताब के अंदर के कुछ अंश होने को तो कौशिला को गोल्ल मन्दिर पहुँचने के लिए देरी हो रही थी, मगर दुमजले पर से मिरदुला सासू ने उखड़े हुए नाखून वाली अँगुली पर ही ठोकर-जैसी मारी, तो कौशिला भी अपने वश में नहीं रह सकी। नदुली, कनस्तर सिर पर धरे, कौतुक देखने को आई हुई जैसी, वहीं पर खड़ी थी। कौशिला ने आधा मुँह नदुली की ओर घुमाया और आधा मिरदुला की ओर ही रहने दिया- "द, अन्याई राँडी! मेरी छातियों का मजाक-जैसा क्या उड़ाती है? बाल-गोपालों वाली महतारी ठहरी, उन्हीं के मुँह से लग-लगकर नीचे झूल गए हैं।... मगर, ईश्वर करे, तेरे पपीते ठोस पाथर-जैसे ही रह जाएँ। रहेंगे क्यों नहीं ठोस, वे नदली? एक सन्तान ठहरी, वह भी न जाने कैसे करतबों से, किस उमर में निकाली। बाद में तो पाथर टूट के दो कभी हुए ही नहीं।... अपने-आप गडेरी के दानों जैसे ठोस बने रहे औरों के पपीते। द, जो राँडियाँ अपनी ही घर-लछमी को इस तरह से सताती हैं, उनके पपीतों में ये लम्बे-लम्बे बालिश्त-बालिश्त-भर के लमपुछिया कीड़े पड़ जायें।" बालिश्त-बालिश्त-भर के कहते हुए, कौंशिला ने बाएँ हाथ के अँगूठे को मिरदुला की ओर घुमाकर, कनिष्ठा को नदुली की ओर फैला दिया। फिर कुछ देर अँगूठे और कनिष्ठा अँगुली के दोनों सिरे तान-तानकर इस तरह से हिलाती रही, जैसे पतंगबाज छोकरे कटी हुई पतंग के धागे को अपनी अँगुलियों में लपेटते हैं

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