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Uttarkand

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2026
9788168653443

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किताब से कुछ अंश आज देव जागर लगा है और कुछ ऐसी झिलमिल-सी है कि लगता है 'एक पंथ दो काज' मुहावरा दुरोपदी पधानी के घर-आँगन में, कबूतरों के जोड़े की तरह फुदकता घूम रहा है। बहू भी ऐसी काशिद आई है कि आँगन की लिपाई से लेकर, देवताओं के आसन लगाने की जगह में गलीचा बिछाने और उस पर फूल-चावल बिखेरने तक के सारे काम हाथों-हाथ जाने कब निबटते चले गये। दुरोपदी पधानी इस समय चबूतरे पर बैठी है। दायें हाथ में पिरमिया की घरवाली, अर्थात् तारामती, की बड़े जतन से भर कर दी गई चिलम थमी है। एक फूंक मारती है, तो कश खींचने की गमक और गुड़गुड़ सारे वातावरण में बजती-सी सुनाई पड़ती है। भरपूरता भी क्या चीज है। कुछ ऐसा अपूर्व-सा भासित होता है कि जाने किसी कितनी पवित्र-सी स्मृतियों में सारी इन्द्रियाँ चैतन्य हैं। शरीर पर के वस्त्र फूल हो गये, तो कितना हलकापन है। नाक से धुआँ छोड़ती है, तो देह में से कोहरा फूटता जान पड़ता है। अट्ठावनवाँ है, लेकिन वो सामने ऊँचाधुर के अरण्य की तरफ दीठ जाती है, तो मंदिर के इर्द-गिर्द के विशाल सल्लिवृक्षों की कौन कहे, उनके बीच में के दाड़िम-वैतरायण के छोटे-छोटे पेड़ तक ठीक उतने ही साफ-साफ दिखाई पड़ जा रहे हैं, जितने अट्ठाईस-तीस की उम्र में दिखाई पड़ते थे। बल्कि बात तो यहाँ तक कही जा सकती है कि अगर कोई अचानक पूछ ही बैठे कि 'पेड़-पौधे ही दिखाई देते हैं इतने दूर से पधानी, या कि सैम देवता के मंदिर के ऊपर की पताका-आ...'

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