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Ardhkumbh Ki Jatra
किताब से कुछ अंश श्रीमती खोसला को उनके निवास तक छोडकर ही वापस लौटे परमेश्वरी बाबू, जो सिर्फ धकान में थे। 'सन्त परांजपे शिशु उद्यान' की तख्ती पढने में कुछ अत्तविधा-सी हई, तो धोती के छोर से चश्मा साफ किया। चश्मा ठीक से पहनकर, दोनों हाथ रिक्शे की गद्दी पर टिका लिये पूरी सुविधा में बैठने के निमित्त, तो जाने क्यों लगा कि श्रीमती खोसला का रिक्शे पर से उतर चुका होना अभी भी यहाँ बना रह गया है। मन में अब इस वक्त जो कुछ अनुभूति है, इसे संगति की प्रशान्तता ही कहा जा सकता है।... रह-रहकर घेर लेने वाला अवसाद अब कहीं ओट में होगा। इस वक्त तो सिर्फ यह है कि कुछ प्रभु-कृपा की सी प्रतीति है मन में। आदमी जैसे आकांक्षा करे, वैसे ही घटित होता जाए इसे और क्या कहा जाए? भीमा और जगतारो गेट से लगे, बातें करते खड़े थे। प्रतीक्षा में। परमेश्वरी बाबू उतरने को हुए, तो लगा, सहारे की जरूरत है। संकोच में रहते कि भीमा पहुँच गया। 'अरे ठीक है।' कहते उतरे परमेश्वरी बाबू जगतारो की तरफ देखते, हँसकर कहने को हुए कि 'ले, आज तो तेरे जी का कंटक दूर हुआ।'... लेकिन लगा कि थकान बहुत है। बैठक में पहुँचते बोले- 'सुबह रामे को फोन करने की याद दिलाना। राधिका के संग ही सोना। नींद में विन्ध्न डालोगी, तो विंध्या माता की जात्रा से रह जाओगी। एक नियम तो भंग ही किया, तुमने...' जगतारो धीमे से दरवाजा उढ़काती, कुछ क्षण वहीं बनी रही। परमेश्वरी बाबू का बैठक की सिटकनी लगाना और भीतर सोने के कमरे तक पहुँचना सुना, तब कमर पर हाथ रखती बरामदे के उस छोर वाले कमरे की ओर बढ़ गई। रधिया से बोली- "बहुत प्रेम से भोजन किये हैं आज, बच्चा बाबू। बड़े दिनों के बाद तृप्ति में दिखाई दिये ।... सब विंध्धामाता की दया।"
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