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Ravindranath Thakur Ke Do Kaaljayi Natak : Chitrangada & Nati Ki Pooja
रवीन्द्र न केवल आम ज़िन्दगी की घटनाओं में, चतुर्दिक फैली रियलिटी की अनेक पर्तों को पारकर शाश्वत सत्य का दर्शन करते हैं, बल्कि, रवीन्द्र का रियलिज़्म रूपकों के दायरों को भी पार करता है और अविरल सत्य को उद्भासित करता है। रवीन्द्र की प्रतीकात्मक कथाएँ हमें सत्य और सुन्दर के पास ले जाती हैं। इसी कारण उन्होंने चित्रांगदा और नटी की पूजा हेतु महाभारत और बौद्धभारत की बहुपठित कथाओं का विषय-वस्तु के रूप में चयन किया। बंगाल की जिस नाट्यधारा का आस्वादन रवीन्द्र ने अपने प्रारम्भिक जीवन में किया उसमें क्लासिकधर्मी संस्कृत नाटक, जात्रा और धार्मिक कीर्तन गीतों का गहरा योगदान है। लोक शिक्षा के द्वारा मनोरंजन की, बंगाल की इस देशज परम्परा की पटभूमि में 18वीं सदी के बिलकुल अन्त में यानी 1795 ई. में एक पूर्णतः नई घटना घटी। जिसका बड़ा ही दूरगामी परिणाम हुआ। नाट्यकला, मंच तथा संगीत को समर्पित एक रूसी पर्यटक जेरासिम लेबेडफ ने यूरोपीय मंच के अनुकरण में सर्वप्रथम बंगाल की रंग-मंच परम्परा में प्रसेनियम थियेटर की बुनियाद रखी। यही समय था जब सम्पूर्ण बंगाल में कुछ बुनियादी परिवर्तन हो रहे थे। सहस्राधिक साधक, दार्शनिक, मनस्वी चिन्तक, लेखक और नई पीढ़ी के वैज्ञानिक अथक श्रम कर रहे थे। राजा राममोहन राय, श्रीरामकृष्ण परमहंस, महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, स्वामी विवेकानन्द, वैज्ञानिक आचार्य जगदीशचन्द्र बोस, , प्रफुल्लचन्द्र राय और असंख्य व्यक्तित्व सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक तथा वैज्ञानिक चिन्तन के जागरण के पुरोधा के रूप में सदा के लिए प्रतिष्ठित हो गए। अदम्य नवजागरण का यही समय था।
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