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Shailesh Matiyani : Chuni hui Kahaniyan
एक कहानी " अहिंसा " का कुछ अंश अभी उसे चारपाई नहीं, जमीन पर ही जगह मिली है, लेकिन अस्पताल की हद में होने का अहसास ही कुछ कम नहीं। परसों तक तस्कीन न थी। गाँव से कस्बे तक बैलगाड़ी और फिर वहाँ से टेंपो में शहर के बस अड्डे तक लाने, और फिर रिक्शे से अस्पताल तक ले जाने की अवधि में, कई बार, पीठ पर लेकर उतारना-चढ़ाना पड़ा था उसे। रात-दिन घर-गृहस्थी के कामों में ताँगे की घोड़ी की तरह खटती औरत का चलने-फिरने तक को दूसरों का मोहताज हो जाना, यह कोई सामान्य संकेत न था। और दरअसल हालत के एकाएक कहीं-से-कहीं पहुँच चुकने का यह साक्षात्कार ही जगेसर को एक-एक क्षण चाँपे रहा था और पहली बार उसे इस दुष्कल्पना में जाना पड़ा कि क्या अब बच्चे अपनी माँ को वापस लौटता नहीं देख सकेंगे? जो औरत मरणांतक यातनाओं के बीच भी बच्चों को यह आश्वासन देती, जाने कैसे मुस्कुराती, बड़े इत्मीनान से बोलती आई है कि, 'जिनावरों को ठीक से रखना। हम जल्दी ही वापस लौदूँगी।' - उसको इस रूप में वापस ले जाना कि बच्चे 'अम्मा!' चीखते हुए छाती पर
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