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DIlli Vidhan Sabha
दिल्ली विधान सभा का ऐतिहासिक भवन हमारे लोकतंत्र की यात्रा का जीवन्त साक्षी है। इम्पीरियल सेक्रेटेरियट से पुराना सचिवालय तक का यह सफ़र हमें बताता है कि कैसे एक अस्थायी भवन समय के साथ दिल्लीवासियों की आवाज़ का स्थायी केंद्र बन गया। सन् 1911 में जब दिल्ली को देश की राजधानी घोषित किया गया, तब प्रशासनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इस भवन का निर्माण हुआ। यहाँ शाही विधान परिषद् और केन्द्रीय विधान सभा की बैठकें हुई। इस भवन में देश के महान् नेताओं-महामना पं. मदनमोहन मालवीय, श्री गोपालकृष्ण गोखले, लाला लाजपत राय, वीर विठ्ठलभाई पटेल और अन्य अनेक राष्ट्रभक्तों की आवाज़ गूंजी। महात्मा गांधी का भी यहाँ तीन बार आगमन हुआ। स्वतंत्रता संग्राम की चर्चाएँ, सवैधानिक विकास के कदम और जनाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति-सब कुछ इस भवन की दीवारों में सुरक्षित है। आज यही भवन दिल्ली विधान सभा के रूप में दिल्लीवासियों की समस्याओं पर चर्चा और क़ानून बनाने का मंच है। यहाँ बैठनेवाले जनप्रतिनिधि दिल्ली के लोगों की आशाओं और अपेक्षाओं के वाहक हैं। इस भवन का इतिहास हमें सिखाता है कि लोकतंत्र निरन्तर जागरुकता, संवाद और जनसेवा का नाम है। दिल्ली विधान सभा केवल विधायी कार्यों तक सीमित न रहकर नयी पीढ़ी को लोकतांत्रिक परम्पराओं और अपने ऐतिहासिक विरासत से परिचित कराने के लिए भी निरन्तर प्रयासरत है। विधान सभा की ओर से नियमित रूप से दिल्ली और आसपास के विभिन्न विद्यालयों और महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए शैक्षिक भ्रमण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इन भ्रमणों के माध्यम से विद्यार्थियों को इस ऐतिहासिक भवन को निकट से देखने, इसके गौरवशाली अतीत को समझने तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज से परिचित होने का अवसर मिलता है। मेरा विश्वास है कि ऐसे प्रयास विद्यार्थियों में इतिहास के प्रति जिज्ञासा, लोकतंत्र के प्रति समझ और राष्ट्र के प्रति ज़िम्मेदारी की भावना को और गहरा करेंगे।
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