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Koi Ajnabi Nahin

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2026
9788168790858

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तेज धूप निकल आने से कंपकंपी छूटनी बंद हो गयी, तो रामप्यारी सोचने लगी कि कहीं कोई उसे तबसे यहाँ बस स्टैंड के पास ही खड़ा न देख रहा हो, जब से वह उमर हुसैन ताँगे वाले की कोठरी से निकलकर आयी है। रामप्यारी जब उमर हुसैन ताँगेवाले की कोठरी से बाहर निकल आयी थी, उस समय घना कोहरा छाया हुआ था और ठंडी हवायें आर-पार ऐसे सनसना रही थीं कि रामप्यारी अपने को किसी बर्फीली नदी में बहता हुआ-सा महसूस कर रही थी। गुस्से और घबराहट में वह लोई भी उमर हुसेन ताँगेवाले के यहाँ ही छोड़ आयी थी और अब सिर्फ धोती और कुरती में उसे ठंडी हवा अपनी सारी देह में कँटीले के पत्तों की तरह चुभती हुई लग रही थी। जैसे कांटा या सुई चुभने पर देह में कँपकँपी-सी उठती है और नसों में बहता हुआ खून पीछे को लौटता हुआ-सा महसूस होता है-तीखी ठंडी हवाओं के बीच में फंसे हुए अपने कद्दावर जिस्म को रामप्यारी ने ठीक वैसे ही पीछे को लौटता हुआ-सा महसूस किया था। उसे याद आया था, जिस समय रेलवे स्टेशन से यहाँ निजामुद्दीन अपने घर तक लाने के लिए उमर हुसेन ने उसे ताँगे पर बिठाया था, उस समय और भी घना कोहरा छाया हुआ था। हवा उस समय जरूर थमी हुई थी। रामप्यारी ने देखा था, खुद ताँगे पर चढ़ने से पहले उमर हुसेन ने घोड़ी के पुढे पर जोर से थाप मारी थी ।... और घोड़ी, अपने सारे जिस्म को कँपकँपाते हुए, कई कदम पीछे तक हटती चली गयी थी।

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