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Manjil Dar Manjil
मुर्गियों का दरबा खानसामा हसन अली की छोटी हवेली- 'सर्वेन्ट क्वार्टर' - से लगा-लगा ही था। फ़ातिमा को एक ओर झटक कर, हसन अली तेज़ी से बाहर निकला और दरबे का दरवाजा आधा खोल लिया-चें-चें-चें-चें... हसन अली के झटकने से, फ़ातिमा बेगम एक ओर को लुढ़क कर रह गई थी। उसके घुटनों और कुहनियों की नसें एकाएक ऐसे खिंच गई थीं, जैसे किसी ने मुर्गी के कटे हुए पंजों की नसें खींच दी हों। हसन अली ख़ानसामा अकसर ऐसा ही करता रहा है। जब भी उसे मुर्गे-मुर्गियों को हलाल करना पड़ा है, उसने पंजे खींचने का अपना शौक़ ज़रूर पूरा किया है। कटे हुए पंजे की थोड़ी-सी बाहर को निकली हुई नस को अपने लहसन छीलने को पाले हुए नाखूनों की चिमटी से बाहर को खींचना और फिर, एक झटके के साथ, मुड़े हुए पंजे को कुछ ऐसी बहशियाना नज़र से देखना, जैसे किसी औरत की मुड़ी हुई नंगी लाश को देख रहा हो... चें-चें-चें-चें
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