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Naagvallari
किताब से कुछ अंश सुबह लगभग अप्रत्याशित रूप से आकाश खुला था। रात काफी बादल थे, जैसी हवा में खनक थी: ऊँची चोटियों पर बर्फ गिरने और भोगाँव-जैसे तलहटी के इलाकों में ओले गिरने की सम्भावना की जा रही थी। गायत्री को रात देर गए नींद आई थी। बादलों का गरजना ऐसा था, जैसे खिड़की-दरवाजे और छत उखाड़ फेंकेंगे। बीच-बीच में बिजली इतनी तेज़ी से कड़कती थी, जी काँप उठता था। कृष्णा मास्टर ने कहा था कि बादलों का ऐसा गरजना सिर्फ़ पहाड़ी इलाकों में ही होता है। कई दिनों के बाद गायत्री आज नहाने गई थी, लौटी तो कृष्णा को लाई-पालक की क्यारियों में काम करते पाया। लगभग बीतते पूस की भोर में पालक की क्यारियाँ गहरे हरे रंग के गलीचों की तरह आकर्षक लग रही थीं। भैंस अभी गोठ में ही थी, मगर प्रकृति के सुबह की पूजा में बैठे होने के से वातावरण में उसके पगुराने की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। जब तक गायत्री लोटे में चाय देकर लाई-पालक की क्यारियों तक पहुँची, पूरा गाँव जाग चुका था और गाय-भैंस दुहकर, घर के भीतर जाती गृहिणियाँ दूर से ही दिखने लग गई थीं।
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