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Punarjanam Ke Baad
किताब से कुछ अंश तो बाई. उस क्षण जेबकतरे रामशरन को लगा कि साक्षात् सरस्वती ही उसकी जान बचाने को आई है और जिंदगी में पहली पहली बार उसने किसी नमस्तस्ये नमस्तस्ये... अलबत्ता उसे तब यह श्लोक याद नहीं था, मगर जो कुछ को मन-ही-मन हाथ जोड़ दिए 'या देवि सर्वभूतेषु मुक्तिरूपेण संस्थिता वह कहना चाहता था, वह अपने-आप में ठीक इतना ही प्रार्थनापर्ण था ।... और जब उसे पुलिस वाले जीप में डाल कर उठा ले गए, तो उसने जेल की जगह अपने को अस्पताल में पड़ा हुआ पाया। रमणीक भाई ने पुलिस में जेब काटने की रिपोर्ट लिखाने से एमदम इन्कार कर दिया था।... अब यह बात तो बेचारा रामशरन पुलिसवालों से पूछ नहीं सकता था कि ऐसा रमणीक भाई ने अपने परसनल टैक्स' की रकम को फजीहत में न डालने के लिए किया था या अपनी बेटी रमाबेन के कहने पर ।... "बहरहाल अस्पताल से 'रिलीज' होकर जब जेबकतरा रामशरन निकला, तो उसकी आत्मा का कायापलट हो चुका था। अहमदाबाद की सड़कों पर फटेहाल और भूखे पेट घूमते हुए उसे तब बार-बार अपनी उस मुक्तिदायी सरस्वती की याद आती थी और वह अपने-आप को उस भरी जवानी में ऐसा अनुभव करता था, जैसे अस्पताल से बाहर निकला हुआ कोई दुधमुँहा बच्चा किसी माँ की तलाश में घूम रहा हो ।... उसे कुछ भी याद नहीं था कि जन्म के समय जिस तरह और बच्चे रोते हैं, उसी तरह वह भी रोया था या नहीं। मगर फिर भी वह उन दिनों जब-कभी झोपड़ियों की ओर जाता था-भिखारिनों के बच्चों के रोने की आवाजें सुन-सुन कर खुद भी उसी तरह फूट-फूट कर रोना चाहता था। बिठ्ठल मामा ने उससे साफ कह दिया कि 'इस कमअकिल साले को किसी जादूगरनी का मन्तर लग गया है। लगता है, किसी नटिनी या कुंजड़िन के चक्कर में फँस गया है कलन्दर! ये 5-5-5 फटी-फटी आँखों से आसमान की तरफ ताकता रहता है! दिमाग बावला हो गया है उसका। मैंने तो पहले ही कहा था कि 'बेटे' औरत की जात जादूगरनी की जात होती है।'
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