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Ramkali

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2026
9788199936386

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किताब से कुछ अंश रामकली को तब भी अपने दोनों बच्चों की आकृतियाँ स्मरण हो आई थीं, लेकिन बच्चों के समीप जाने का मन बना नहीं सकी वह, और, यह कहती, औरतों में वापस लौट आना चाहती थी कि 'फिर कभी घर पर ही आकर देख लूँगी।' हालाँकि रामकली जानती थी कि सामान्य दिनों में बच्चों से घर जाकर मिलना तो और भी कठिन है लेकिन फिर भी रामकली के निकट यह बात स्पष्ट है कि अन्ततः बसन्तलाल के साथ वह बच्चों को एक नजर देख लेने के इरादे से चल पड़ी थी, तो इसमें बसन्तलाल की भलमनसाहत का दबाव ज्यादा था। वह, शायद, अष्टमी का दिन था। एक दिन विजयादशमी की सन्ध्या तो वह बसन्तलाल के घर भी पहुँच गई थी। वह पहला अवसर था, जब रामकली कमला पहलवान के घर बैठ जाने के बाद बसन्तलाल के दरवाजे पर गई थी। उसके बाद भी इक्का-दुक्का भेंट हुई है और बसन्तलाल ने अत्यन्त आग्रह के साथ कहा है, जैसे कि प्रायश्चित करना चाहता हो, लेकिन रामकली ने हमेशा साफ दो-टूक जवाब दे दिया है कि 'अब इस किस्से को खत्म ही समझो, बसन्ता ! और सच पूछो तो हमारी आँखों में अब वो नजर ना रही, जो तुम्हारे घर का रास्ता पहचानती थी।' कहना तो हर बार रामकली यह भी चाहती थी कि 'वो दशमी के रोज भी हम नहीं आए थे तुम्हारे दरवाजे, बसन्ता, कमला पहलवान की मार ले आई थी।'... लेकिन ऐसा कहने में अपने छोटेपन को स्वीकार कर लेने की तकलीफ महसूस होती, इसीलिए न रामकली ने कमला पहलवान के द्वारा मारे और प्रताड़ित किये जाने की बात तब कही थी बसन्तलाल से, न दुबारा किसी मुलाकात में और न आज कहनी है-और न फिर कभी।

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