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Yashodhara

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2025
978-93-48409-64-5

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तुम कहानियाँ लिखते-पढ़ते हो। सुनो, एक कहानी। सन्ध्या हो रही थी। किसी गाँव के एक कृषक गृहस्थ के चत्वर पर कोई हारा-थका पथिक अपनी पोटली रखकर बैठ गया और अपने दुपट्टे के छोर से व्यजन करने लगा। गृहस्थ ने घर से निकल कर कहा- "महाराज, यहाँ ठहरने का स्थान गाँव के बाहर का शिवालय है।" आगन्तुक ने दीन भाव से कहा- “भैया, हमें कुछ न चाहिये। थके माँदें कहाँ जायेंगे? रात भर यहीं एक ओर पड़े रहने दो। सबेरे अपना मार्ग लेंगे।" "कुछ कथा-वार्ता, रामायण आदि कहते हो?" "यदि इसके बिना आश्रय न मिले तो कुछ सुना दूँगा।" "तब पड़े रहो।" गृডিहस्थ भीतर गया। तनिक देर में उसका लड़का बाहर से आया। पथिक को उसी भाँति उससे भी निबटना पड़ा। परन्तु वह माता (देवी) के भजनों का प्रेमी था। पथिक ने उसके लिए भी हामी भरी।। थोड़ी देर में उसका भाई आ पहुँचा। उससे भी वही झंझट। वह आल्हा का रसिक था। पथिक को आल्हा सुनाना भी स्वीकार करना पड़ा।

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